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नरसिंह जयंती,भक्ति और दृढ़ विश्वास की जीत का प्रतीक

कुल्लू अपडेट, हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने अधर्म के नाश के लिए कई अवतार लिए तथा धर्म की स्थापना की। ऐसे ही भगवान विष्णु  के 12 अवतारों में से छठें अवतार हैं नरसिंह। भगवान नरसिंह शक्ति एवं पराक्रम के देवता हैं। भगवान नरसिंह अधर्म और अत्याचार करने वाले को कठोर दंड देते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने आधा मनुष्य व आधा शेर का शरीर धारण करके दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यपु का वध किया था। इसलिए इस दिन नरसिंह जयंती मनाई जाती है। इस वर्ष नरसिंह जयंती 4 मई को मनाई जाएगी।  
कहा जाता है कि ऋषि कश्यप के दो पुत्रों में से एक का नाम हिरण्यकश्यप था। उसने कठोर तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर आशीर्वाद प्राप्त किया था कि उसे न तो कोई मानव मार सकेगा और न ही कोई पशु, न दिन में उसकी मृत्यु होगी न रात में, न घर के भीतर और न बाहर, न धरती पर और न आकाश में, न किसी अस्त्र से और न ही किसी शस्त्र से। यह वरदान प्राप्त कर वह अहंकारी हो गया और स्वयं को अपराजेय और अमर समझने लगा। उसके अत्याचार से तीनों लोको में हाहाकार मच गया। यह वरदान प्राप्त करके वह खुद को ईश्वर समझ बैठा था। हिरण्यकश्यप अपनी प्रजा को अपनी पूजा करने के लिए दबाव डालने लगा। जो उसकी पूजा नहीं करता उसे यातनाएं देता था। वह भगवान विष्णु के भक्तों पर क्रोध करता था। हिरण्यकश्यप का एक पुत्र था, जिसका नाम प्रह्लाद था। वह भगवान विष्णु का परमभक्त था। जब इसकी जानकारी हिरण्यकश्यप को हुई तो उसने प्रह्लाद को समझाया। उसने अपने बेटे से कहा कि उसके । लेकिन हिरण्यकश्यप के बार-बार मना करने पर भी प्रह्लाद ने भगवान विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। हिरण्यकश्यप ने इसे अपना अपमान समझ कर प्रह्लाद को मारने के लिए कई यत्न किए, लेकिन श्रीहरि विष्णु की कृपा से वह बच जाता। 
             अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने के लिए मनाया। होलिका को वरदान मिला था कि आग से उसका बाल भी बांका नहीं होगा। लेकिन जब होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठी, तो श्रीहरि की कृपा से वह स्वयं उस आग में जल गई और प्रह्लाद बच गया। जब प्रह्लाद ने उससे कहा कि भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं, तो हिरण्यकश्यप ने उसे चुनौती देते हुए कहा कि अगर तुम्हारे भगवान सर्वत्र हैं, तो इस स्तंभ में क्यों नहीं दिखते। क्रोधित हिरण्कश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद को खंभे से बांध कर उसे मारने के लिए अपनी तलवार निकाली और बोला बता तेरा भगवान कहां है, प्रहलाद ने कहा कि भगवान यहीं इसी खंबे में  हैं, जहां आपने मुझे बांध रखा है। जैसे ही हिरण्कश्यप ने प्रह्लाद को मारना चाहा, वैसे ही भगवान विष्णु  नृसिंह का अवतार लेकर खंभे से बाहर निकल आए और हिरण्कश्यप  को उठा लिया और उसे महल की दहलीज पर ले आए। भगवान नृसिंह ने उसे अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका सीना चीर डाला और उसका वध कर दिया।
              जिस स्थान पर नृसिंह ने हिरण्यकश्यप का वध किया, वह न घर के भीतर था, न बाहर। उस समय गोधुलि बेला थी यानी न दिन था और न रात। नृसिंह न पूरी तरह से मानव थे और न ही पशु। हिरण्यकश्यप का वध करते समय उन्होंने नृसिंह ने उसे अपनी गोद में लिटाया था, इसलिए वह न धरती पर था और न आकाश में। उन्होंने अपने नाखून से उसका वध किया, इस तरह वहां न अस्त्र का उपयोग हुआ और न शस्त्र का। इसी दिन को नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है।
यह दिन इस बात का प्रमाण है कि यदि ईश्वर की भक्ति के साथ-साथ ईश्वर पर दृढ़ विश्वास भी हो तो भगवान की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। संकट की घड़ी में भगवान को पुकारना ही काफी नहीं है। मन में भगवान के प्रति निष्ठा,आस्था और दृढ़ विश्वास भी होना चाहिए जैसा कि कठिन परिस्थिति में भी प्रह्लाद ने अपनी ईश्वर में आस्था और दृढ़ विश्वास बाए रखा तो भगवान ने उसकी रक्षा की। 

Kullu Update
Author: Kullu Update

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