आस्था अपडेट ,नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान,शक्ति देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। माघ, चैत्र, आषाढ,अश्विन मास नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि मुख रूप से साल में 2 बार मनाया जाता है एक चैत्र मास में और दूसरी अश्विन मास पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से सुरु होती है और दशमी तिथि को मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के साथ समाप्त होती है
कलश स्थापना मुहूर्त :- ज्योतिषाचार्य के अनुसार शारदीय नवरात्रि में इस बार घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त 15 अक्टूबर को सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक है. कलश स्थापना के लिए 46 मिनट का वक्त मिलेगा. इस समय अभिजीत मुहूर्त है. अगर आप भी नवरात्रि में कलश की स्थापना करने वाले हैं और पूरे नौ दिन व्रत पर रहने वाले हैं तो शुभ मुहूर्त का ध्यान रखें. नवरात्रि का पहले दिन कलश स्थापना के साथ मां शैलपुत्री की पूजा अर्चना की जाती है. मान्यता है कि कलश स्थापना करने से मां दुर्गा प्रसन्न होकर सभी भक्तों की इच्छाओं की पूर्ति करती हैं. इससे भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं.
माँ दुर्गा के नौ रूप :- शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,चंद्रघंटा ,कूष्माण्डा ,स्कन्दमाता ,कात्यायनी ,कालरात्रि ,महागौरी ,सिद्धिदात्री
प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री देवी :- शैलपुत्री देवी दुर्गा के नौ रूप में पहले स्वरूप में जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।
स्वरूप :- इन माताजी के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। अपने पूर्व जन्म में ये प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। तब इनका नाम ‘सती’ था। इनका विवाह भगवान शंकरजी से हुआ था।
मां शैलपुत्री पूजन विधि :- नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना के बाद मां शैलपुत्री की पूजा करते हैं. मां शैलपुत्री की पूजा करने के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और दैनिक कार्यों से निवृत होकर स्नान-ध्यान कर लें. इसके बाद अपने पूजाघर की साफ-सफाई करें. फिर पूजाघर में एक चौकी स्थापित करें और उस पर गंगाजल छिड़क दें. इसके बाद चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर माता के सभी स्वरूपों को स्थापित करें. अब आप मां शैलपुत्री की वंदना करते हुए व्रत का संकल्प लें. माता रानी को अक्षत्, धूप, दीप, फूल, फल, मिठाई, नैवेद्य आदि अर्पित करें. मनोकामना पूर्ति के लिए मां शैलपुत्री को कनेर पुष्प चढ़ाएं और उनको गाय के घी का भोग लगाएं. पूजा के दौरान मां शैलपुत्री के मंत्रों का उच्चारण करें. आखिरी में घी का दीपक जलाएं और माता की आरती करें. यदि आपकी कुंडली में चंद्रमा का दोष है या चंद्रमा कमजोर है तो आप मां शैलपुत्री की पूजा जरूर करें. इससे आपको काफी लाभ होगा.
मां शैलपुत्री का पूजा मंत्र :- ओम देवी शैलपुत्र्यै नमः




